Makhanlal Chaturvedi Birth Anniversary: जब पत्रकारिता ने चलाया गो-संरक्षण का सफल आंदोलन
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी उन विरले स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रणी हैं, जिन्होंने अपनी संपूर्ण प्रतिभा को राष्ट्रीयता के जागरण एवं स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। अपने लंबे पत्रकारीय जीवन के माध्यम से माखनलाल जी ने रचना, संघर्ष और आदर्श का जो पाठ पढ़ाया वह आज भी हतप्रभ कर देने वाला है। आज की पत्रकारिता के समक्ष जैसे ही गो-हत्या का प्रश्न आता है, वह हिंदुत्व और सेकुलरिज्म की बहस में उलझ जाता है। इस बहस में मीडिया का बड़ा हिस्सा गाय के विरुद्ध ही खड़ा दिखाई देता है। सेकुलरिज्म की आधी-अधूरी परिभाषाओं ने उसे इतना भ्रमित कर दिया है कि वह गो-संरक्षण जैसे राष्ट्रीय महत्व के विषय को सांप्रदायिक मुद्दा मान बैठा है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में गो-संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है, इस बात को समझना कोई टेड़ी खीर नहीं। हद तो तब हो जाती है जब मीडिया गो-संरक्षण या गो-हत्या को हिंदू-मुस्लिम रंग देने लगता है। गो-संरक्षण शुद्धतौर पर भारतीयता का मूल है। इसलिए ही ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से विख्यात महान संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी गोकशी के विरोध में अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी पत्रकारिता के माध्यम से देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर देते हैं। गोकशी का प्रकरण जब उनके सामने आया, तब उनके मन में द्वंद्व कतई नहीं था। उनकी दृष्टि स्पष्ट थी- भारत के लिए गो-संरक्षण आवश्यक है। कर्मवीर के माध्यम से उन्होंने खुलकर अंग्रेजों के विरुद्ध गो-संरक्षण की लड़ाई लड़ी और अंत में विजय सुनिश्चित की।1920 में मध्यप्रदेश के शहर सागर के समीप रतौना में ब्रिटिश सरकार ने बहुत बड़ा कसाईखाना खोलने का निर्णय लिया। इस कसाईखाने में केवल गोवंश काटा जाना था। प्रतिमाह ढाई लाख गोवंश का कत्ल करने की योजना थी। अंग्रेजों की इस बड़ी परियोजना का संपूर्ण विवरण देता हुआ चार पृष्ठ का विज्ञापन अंग्रेजी समाचार-पत्र हितवाद में प्रकाशित हुआ। परियोजना का आकार कितना बड़ा था, इसको समझने के लिए इतना ही पर्याप्त होगा कि लगभग 100 वर्ष पूर्व कसाईखाने की लागत लगभग 40 लाख रुपये थी। गो-मांस के परिवहन के लिए कसाईखाने तक रेल लाइन डाली गई थी। तालाब खुदवाये गए थे। कत्लखाने का प्रबंधन सेंट्रल प्रोविंसेज टेनिंग एंड ट्रेडिंग कंपनी ने अमेरिकी कंपनी सेंट डेविन पोर्ट को सौंप दिया था, जो डिब्बाबंद बीफ को निर्यात करने के लिए ब्रिटिश सरकार की अनुमति भी ले चुकी थी। गोवंश की हत्या के लिए यह कसाईखाना प्रारंभ हो पाता उससे पहले ही दैवीय योग से महान कवि, स्वतंत्रता सेनानी और प्रख्यात संपादक पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने यात्रा के दौरान यह विज्ञापन पढ़ लिया। वह तत्काल अपनी यात्रा खत्म करके वापस जबलपुर लौटे। वहाँ उन्होंने अपने समाचार पत्र “कर्मवीर” में रतौना कसाईखाने के विरोध में तीखा संपादकीय लिखा और गो-संरक्षण के समर्थन में कसाईखाने के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाने का आह्वान किया। सुखद तथ्य यह है कि इस कसाईखाने के विरुद्ध जबलपुर के एक और पत्रकार उर्दृ दैनिक समाचार पत्र 'ताज' के संपादक मिस्टर ताजुद्दीन मोर्चा पहले ही खोल चुके थे। उधर, सागर में मुस्लिम नौजवान और पत्रकार अब्दुल गनी ने भी पत्रकारिता एवं सामाजिक आंदोलन के माध्यम से गोकशी के लिए खोले जा रहे इस कसाईखाने का विरोध प्रारंभ कर दिया। मिस्टर ताजुद्दीन और अब्दुल गनी की पत्रकारिता में भी गोहत्या पर वह द्वंद्व नहीं था, जो आज की मीडिया में है।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Birth Anniversary: भारत के पहले फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने पाकिस्तान को चटाई थी धूल, ऐसे सेना में हुए थे भर्तीदादा माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिष्ठा संपूर्ण देश में थी। इसलिए कसाईखाने के विरुद्ध माखनलाल चतुर्वेदी की कलम से निकले आंदोलन ने जल्द ही राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। देशभर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों में रतौना कसाईखाने के विरोध में लिखा जाने लगा। लाहौर से प्रकाशित लाला लाजपत राय के समाचार पत्र वंदेमातरम् ने तो एक के बाद एक अनेक आलेख कसाईखाने के विरोध में प्रकाशित किए। दादा माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता का प्रभाव था कि मध्यभारत में अंग्रेजों की पहली हार हुई। मात्र तीन माह में ही अंग्रेजों को कसाईखाना खोलने का निर्णय वापस लेना पड़ा। आज उस स्थान पर पशु प्रजनन का कार्य संचालित है। जहाँ कभी गो-रक्त बहना था, आज वहाँ बड़े पैमाने पर दुग्ध उत्पादन हो रहा है। कर्मवीर के माध्यम से गो-संरक्षण के प्रति ऐसी जाग्रती आई कि पहले से संचालित कसाईखाने भी स्वत: बंद हो गए। हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र का वातावरण बना सो अलग। दादा माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रकारिता का यह प्रसंग किसी भव्य मंदिर के शिखर कलश के दर्शन के समान है। यह प्रसंग पत्रकारिता के मूल्यों, सिद्धांतों और प्राथमिकता को रेखांकित करता है।यह ‘पत्रकारिता’ का सौभाग्य था कि उसे दादा माखनलाल जैसा सुयोग्य संपादक प्राप्त हुआ, जिसने भारत की पत्रकारिता में ‘भारतीयता’ के भाव की स्थापना की। माखनलाल चतुर्वेदी भारतीय पत्रकारिता के ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं, जिनसे आज भी भारत की पत्रकारिता आलोकित हो सकती है। - लोकेन्द्र सिंह सहायक प्राध्यापक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (मध्यप्रदेश)

Makhanlal Chaturvedi Birth Anniversary: जब पत्रकारिता ने चलाया गो-संरक्षण का सफल आंदोलन
Haqiqat Kya Hai
लेखिका: सुमिता मेहरा, टीम नेतानगरी
परिचय
हर साल 4 अप्रैल को, भारतीय पत्रकारिता के दिग्गज और गो-संरक्षण आंदोलन के पथप्रदर्शक, मक्खनलाल चतुर्वेदी की जयंती मनाई जाती है। उनका जीवन और कार्य न केवल पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय था, बल्कि उन्होंने समाज में चेतना लाने का कार्य भी किया। उनके योगदान की याद में, यह लेख उनके प्रभावशाली कार्य और गो-संरक्षण आंदोलन पर आधारित है।
मक्खनलाल चतुर्वेदी का जीवन और पत्रकारिता
मक्खनलाल चतुर्वेदी का जन्म मध्य प्रदेश के बलागढ़ में 4 अप्रैल 1889 को हुआ था। उन्होंने अपनी पत्रकारिता की यात्रा की शुरुआत 'नवजीवन' पत्रिका से की। उनका लेखन न केवल समाचारों को प्रस्तुत करता था, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी गहरा ध्यान केंद्रित करता था। उनकी लेखनी में एक स्पष्ट उद्देश्य था – समाज का जागरण।
गो-संरक्षण आंदोलन की शुरुआत
दूसरे प्रारंभिक वर्षों में, चतुर्वेदी ने गो-संरक्षण के महत्व को समझते हुए इस मुद्दे को पत्रकारिता का हिस्सा बनाया। उन्होंने अपने लेखों के माध्यम से गो-माता की महिमा और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों को गो-संरक्षण के लिए जागरूक किया।
पत्रकारिता की ताकत
चतुर्वेदी ने पत्रकारिता को एक सशक्त माध्यम मानते हुए, इसे समाज में बदलाव लाने का एक उपकरण बनाया। उनके लेखों ने समाज में गो-संरक्षण की आवश्यकता के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने यह साबित किया कि पत्रकारिता केवल सूचना का संचार नहीं, बल्कि सही दिशा में समाज को चलाने का कार्य भी करती है।
गो-संरक्षण आंदोलन का सफल परिणाम
चतुर्वेदी के प्रयासों के फलस्वरूप, गो-संरक्षण आंदोलन ने देश भर में व्यापक समाजिक ध्यान आकर्षित किया। इस आंदोलन ने गो-वध के खिलाफ ठोस कदम उठाने में मदद की एवं लोगों को इस मुद्दे पर सोचने पर मजबूर किया। आज भी, गो-संरक्षण का आंदोलन उनकी विचारधारा का प्रतिबिंब है।
सारांश
मक्खनलाल चतुर्वेदी का योगदान केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने समाज को गो-संरक्षण के महत्व के प्रति जागरूक करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका जीवन एक प्रेरणा है, जो हमें यह सिखाता है कि पत्रकारिता कैसे सामाजिक बदलाव का साधन बन सकती है। हमें चतुर्वेदी के सिद्धांतों को अपनाकर, अपने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए।
उनकी जयंती पर, उन्हें याद करते हुए हम यह संकल्प लें कि हम उनके विचारों का पालन करेंगे और पत्रकारिता के माध्यम से समाज में सकारात्मक योगदान देंगे।
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