करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा राज करते रहेंगे मनोज (भारत) कुमार

‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ तथा ‘क्रांति’ जैसी उन्नत एवं श्रेष्ठ फिल्में बनाने वाले दिग्गज निर्माता, निर्देशक, लेखक और अभिनेता मनोज कुमार का 87 साल की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। वे पिछले कुछ महीनों से ‘डीकंपेंसेटेड लिवर सिरोसिस’ नामक बीमारी से जूझ रहे थे। 21 फरवरी को स्थिति बिगड़ने पर उन्हें कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां पर शुक्रवार की सुबह अंतिम सांस ली। ‘भारत कुमार’ के नाम से लोकप्रिय रहे मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों के जरिए देशभक्ति की ऐसी अलख जगाई, जो आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में जीवित है। बहरहाल, उनके निधन से न केवल हिंदी सिनेमा जगत्, बल्कि देश और दुनिया भर में निवास करने वाले उनके प्रशंसकों में शोक की लहर छा गई है। मनोज कुमार की लोकप्रियता का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा अभिनीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा... मै गीत वहां के गाता हूं... भारत का रहने वाला हूं... भारत की बात सुनाता हूं...’ शीर्षक गीत आज भी लोग सुनते नहीं अघाते। यहां तक कि आज की पीढ़ी में भी उनके द्वारा अभिनीत देशभक्ति गीतों को सुनने वाले बहुत बड़ी संख्या में मिल जाएंगे।होठों पर मीठी मुस्की, आंखों में स्वाभिमान की लौ, गले में देशभक्ति के सुर और चाल में मस्तानापन के लिए देश-विदेश में विख्यात् मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार जब सिल्वर स्क्रीन पर अपने अभिनय का जादू बिखेर रहे होते थे, तब देश भर के सिनेमा घरों में बैठे दर्शकों के दिल और दिमाग में उत्तेजना से भरी एक अद्भुत शांति व्याप्त रहती थी। देशभक्ति, साहस, दृढ़ता और सिनेमा के प्रति समर्पण का भाव रखने वाले मनोज कुमार को भारतीय सिनेमा में किए गए योगदानों के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। गौरतलब है कि उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनके नाम एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अलग-अलग श्रेणियों में सात फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल हैं। भारतीय कला में अद्भुत योगदान के लिए सरकार द्वारा उन्हें 1992 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इनके अलावा, 2015 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 24 जुलाई 1937 को ऐबटाबाद में जन्मे मनोज कुमार का वास्तविक नाम हरिकिशन गिरी गोस्वामी था। बंटवारे के बाद ऐबटाबाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गया, जिसके बाद उनके माता-पिता ने भारत में रहना स्वीकार किया और वे दिल्ली आ गए। मनोज कुमार ने बंटवारे के दर्द को अपनी आंखों से देखा था।इसे भी पढ़ें: Sam Manekshaw Birth Anniversary: भारत के पहले फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने पाकिस्तान को चटाई थी धूल, ऐसे सेना में हुए थे भर्तीवे अशोक कुमार, दिलीप कुमार और कामिनी कौशल के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनकी सारी फिल्में देखते थे। उनके नाम बदलने से जुड़ी एक रोचक घटना है कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही हरिकिशन दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत फिल्म ‘शबनम’ देखने गए और उनके किरदार से इतने प्रभावित हुए कि उसके नाम पर ही उन्होंने अपना नाम ‘मनोज कुमार’ रख लिया था। मनोज कुमार कॉलेज के दिनों में दिल्ली में रहते हुए थिएटर से जुड़े हुए थे। थिएटर करते-करते एक दिन अचानक उन्होंने दिल्ली से मुंबई का रास्ता चुन लिया। मुंबई आकर उन्होंने फिल्मों में कार्य तलाशना शुरू किया। अभिनेता के रूप में उनके करियर की शुरुआत 1957 में आई फिल्म ‘फैशन’ से हुई थी। उसके बाद, 1960 में उनकी अगली फिल्म ‘कांच की गुड़िया’ आई, जिसमें उन्होंने बतौर लीड अभिनेता कार्य किया। सौभाग्य से, उनकी यह फिल्म बहुत चली। उसके बाद तो बतौर अभिनेता मनोज कुमार का करियर लगातार ऊंचाइयां छूता चला गया। ‘उपकार’, ‘पत्थर के सनम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘संन्यासी’, ‘शहीद’, ‘क्रांति’ आदि उनकी कुछ अत्यंत लोकप्रिय एवं सुपर हिट फिल्में थीं। देशभक्त मनोज कुमार ने अपनी अधिकतर फिल्में देशभक्ति की थीम पर बनाई थीं और उन फिल्मों में मनोज कुमार ने ‘भारत कुमार’ के रूप में अभिनय किया था। यही कारण है कि वे अपने प्रशंसकों के बीच ‘भारत कुमार’ के नाम से विख्यात हुए।गौरतलब है कि 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान उनका परिवार दिल्ली आया, जहां उन्होंने शरणार्थी शिविरों में बेहद कठिन वक्त गुजारे। उस दौरान ही उनके मन में देश के लिए कुछ करने की भावना जागी। भगत सिंह के व्यक्तित्व से गहरे प्रभावित मनोज ने सिनेमा को माध्यम बनाया और अपनी देशभक्ति की फिल्मों के जरिए अपने देशप्रेम को सुनहरे पर्दे पर उतारा। उनका मानना था कि फिल्में केवल मनोरंजन का नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का जरिया भी होती हैं। जाहिर है कि अपने इसी सिद्धांत का अनुसरण करते हुए उन्होंने देशभक्ति पर आधारित अनेक फिल्में बनाईं, जो फिल्मकारों एवं आलोचकों के बीच खूब सराही भी गईं और सुपर हिट भी रहीं। मनोज कुमार की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक ‘उपकार’ (1967) से जुड़ी एक बहुत रोमांचक कहानी है। दरअसल,  1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उनकी फिल्म ‘शहीद’ देखी थी। भगत सिंह के जीवन पर बनी इस फिल्म से प्रभावित होकर शास्त्री जी ने मनोज कुमार से अपने लोकप्रिय नारे ‘जय जवान जय किसान’ पर एक फिल्म बनाने के लिए कहा। मनोज कुमार ने शास्त्री जी के उस सुझाव को गंभीरता से लिया और रेलयात्रा करते हुए दिल्ली से मुंबई लौटते समय ही ‘उपकार’ की कहानी लिख डाली। न सिर्फ यह फिल्म सुपर हिट रही, बल्कि इसके गाने भी बहुत लोकप्रिय हुए। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे-मोती...’ शीर्षक गीत तो उन दिनों जन-जन की जुबान पर थी।मनोज कुमार न सिर्फ अपनी देशभक्ति, बल्कि दृढ़ता और साहस के लिए भी विख्यात् थे, लेकिन यही दृढ़ता और साहस बाद में उनके लिए संकट भी बन गए, जब 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा देश में लगाए गए आपातकाल (इमरजेंसी) का विरोध करके उन्होंने सरकार को नाराज कर दिया था। सरकार की नाराजगी का परिणाम यह हुआ कि मनोज कुमार ने जब अपनी सुपरहिट फिल्म ‘शोर’ को सिनेमाघरों में दोबारा रिलीज

Apr 5, 2025 - 11:39
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करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा राज करते रहेंगे मनोज (भारत) कुमार
करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा राज करते रहेंगे मनोज (भारत) कुमार

करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में हमेशा राज करते रहेंगे मनोज (भारत) कुमार

Haqiqat Kya Hai

लेखक: सुमन शर्मा, टीम नेटानगरी

परिचय

मनोज कुमार, बॉलीवुड के एक प्रसिद्ध अभिनेता और निर्माता, भारतीय सिनेमा के गौरव और प्रेरणा का प्रतीक हैं। उनकी फिल्में और अभिनय शैली न केवल दर्शकों के दिलों में छा गई हैं, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं। आइए जानते हैं कि कैसे मनोज कुमार ने भारतीय सिनेमा में अपनी अद्वितीय पहचान बनाई और करोड़ों प्रशंसकों के दिलों में राज करते रहेंगे।

मनोज कुमार का प्रारंभिक जीवन

मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को दिल्ली में हुआ था। उनके बचपन का सपना एक अभिनेता बनने का था और उन्होंने कॉलेज के जीवन में ही थिएटर से जुड़े कामों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था।कोई न कोई वजह से ही तो उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश किया और धीरे-धीरे उनके अभिनय का जादू दर्शकों पर छाने लगा।

फिल्मी करियर की शुरुआत

मनोज कुमार ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1960 में की थी। उनकी पहली फिल्म 'फंटूश' थी, जिसमें उनकी अदाकारी को काफी सराहा गया। लेकिन असली पहचान उन्हें 'उपकार' फिल्म से मिली, जिसमें उन्होंने एक ऐसे कैरेक्टर का किरदार निभाया, जो देशभक्ति, समाजिकता और मानवता की भावना को उजागर करता है।

सफलता की सीढ़ियाँ

मनोज कुमार ने अपने करियर में कई सफल और यादगार फिल्में दी हैं जैसे 'बीवी-बीवी', 'रोटी कपड़ा और मकान' और 'क्रांति'। उनकी फिल्में न केवल box office पर हिट रहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों को भी जागरूकता पैदा करने में मदद की। उनके संवाद और गाने आज भी लोग गुनगुनाते हैं, जो उनकी सच्ची प्रतिभा को दर्शाता है।

मनोज कुमार का योगदान

मनोज कुमार ने भारतीय सिनेमा में कई ऐसे बिंदुओं का बलिदान दिया जो आज भी समाज में महत्वपूर्ण हैं। वे सामाजिक मुद्दों को अपने फिल्मी कामों के माध्यम से उठाते रहे हैं, जैसे गरीबी, बेरोजगारी, और देशभक्ति। उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा और उनकी फिल्मों का उद्देश्य आज भी क्लासिक हिट हैं।

मनोज कुमार की कड़ी मेहनत और संघर्ष

मनोज कुमार की सफलता आसान नहीं थी; उन्होंने अपने करियर में कई चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने अपनी मेहनत और संघर्ष से साबित किया कि अगर आदमी में कुछ करने की लगन और जूनून हो, तो वह किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह प्रेरणा देने वाली कहानी युवा पीढ़ी के लिए एक मिसाल है।

निष्कर्ष

मनोज कुमार का नाम भारतीय सिनेमा में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। उनकी फिल्में, संवाद और फ़िल्मी योगदान हमेशा प्रशंसकों के दिलों में जीवित रहेंगी। हम सब जानते हैं कि वे सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि सिनेमा के एक सच्चे प्रतिनिधि हैं जो अपने काम के माध्यम से देश की रगों में बहे हैं। मनोज कुमार हमेशा हमारे दिलों में राज करते रहेंगे।

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