देहरादून में मियावाकी तकनीक से विकसित जंगल, सामुदायिक सहयोग से 90% पौधों की सफलता
DEHRADUN: देहरादून में पौधे लगाने की मियावाकी पद्धति रंग लाती दिख रही है। वन विभाग और शहर की स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से 3 साल वर्ष पहले वसंत विहार, पंडितवाड़ी मुख्य मार्ग पर मेजर विवेक गुप्ता चौक के निकट जापानी मियावाकी तकनीक पर आधारित अर्बन फॉरेस्ट्री के एक पायलट एक्सपेरिमेंट की शुरुआत की गई थी। […] The post देहरादून में नई तकनीक से विकसित हो रहे जंगल, सामुदायिक सहयोग से 90% पौधों जीवित appeared first on Devbhoomi Dialogue.
देहरादून में मियावाकी तकनीक से विकसित जंगल, सामुदायिक सहयोग से 90% पौधों की सफलता
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कम शब्दों में कहें तो, देहरादून में मियावाकी पद्धति अब एक सफल प्रयोग साबित हुई है। तीन साल पहले शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट आज 90% पौधों के जीवित रहने के कारण सभी के लिए प्रेरणा बना है।
देहरादून, उत्तराखंड: जापानी मियावाकी तकनीक के तहत देहरादून में अर्बन फॉरेस्ट्री का एक अद्वितीय प्रयोग सफलतापूर्वक चल रहा है। वन विभाग और विभिन्न स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं ने मिलकर इस पहल को 3 वर्ष पहले शुरू किया था। इसे वसंत विहार, पंडितवाड़ी मुख्य मार्ग पर मेजर विवेक गुप्ता चौक के निकट लगाया गया था।
इस पहल के तहत 300 से अधिक स्थानीय एवं संगठनों के अनुकूल पौधों का रोपण किया गया था। तीन वर्षों के बाद, अब तक 90% से अधिक पौधे जीवित हैं, जो शहरी क्षेत्रों में सामुदायिक सहयोग और अर्बन फॉरेस्ट्री की संभावनाओं को दर्शाते हैं।
प्रगति की कहानी
इस पौधरोपण परियोजना को उत्तराखंड वन विभाग के रिसर्च विंग, वसंत विहार दून वैली ऑफिसर्स कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी, एसडीसी फाउंडेशन और एसजीआई फाउंडेशन के सहयोग से विकसित किया गया था। जिन पौधों में शामिल हैं, वे हैं - अमलतास, नीम, भीमल, तेजपत्ता, सहजन, पारिजात, कचनार प्रजातियाँ। यह सभी पौधे उत्तराखंड की जलवायु और पारिस्थितिकी के अनुकूल हैं।
2023 के लिए यह पहल अर्बन फॉरेस्ट के एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में रूपांतरित की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र का विकास करना था। एसडीसी फाउंडेशन और एसजीआई फाउंडेशन ने लगभग तीन वर्षों तक इस पौधरोपण स्थल की देखभाल करने का काम किया।
प्रेरणा और योजनाएं
इस पौधरोपण की प्रेरणा उत्तराखंड में पहले से चले आ रहे सफल मियावाकी कार्यों से मिली थी। कालसी में वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी और उनकी टीम द्वारा विकसित मॉडल ने इस पहल को दिशा दी। तीसरी वर्षगांठ के आयोजन में चतुर्वेदी ने बताया कि मियावाकी तकनीक को केवल पौधे लगाने की एक विधि नहीं, बल्कि पर्यावरण पुनर्स्थापन का एक महत्वपूर्ण माध्यम समझा जाना चाहिए।
उन्होंने स्थानीय प्रजातियों के चयन, मिट्टी की तैयारी, उपयुक्त पौध रोपण घनत्व और निरंतर रखरखाव के महत्व को उजागर किया। यह भी बताया कि गर्मियों में बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के लिए ऐसे प्रयासों को व्यापक स्तर पर बढ़ाना आवश्यक है।
समुदाय का योगदान
एसडीसी फाउंडेशन के अनूप नौटियाल के अनुसार, तीन वर्ष पूरे होना इस शहरी वानिकी पहल के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह प्रयोग दर्शाता है कि जब क्षेत्रीय संस्थाएं, समुदाय और नागरिक समाज संगठन सामूहिक रूप से काम करते हैं, तो शहरी सीमाओं के भीतर भी हरित क्षेत्र का विकास संभव है।
एसजीआई फाउंडेशन की प्रेरणा रतूड़ी ने बताया कि यह पहल न केवल शहरी हरित क्षेत्रों के निर्माण में मदद कर रही है, बल्कि यह दीर्घकालिक पर्यावरणीय कार्यक्रमों का भी आधार बन सकती है। ऐसे प्रयासों को केवल एक बार के पौधरोपण अभियानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
विकास और भविष्य की योजनाएं
एसडीसी के मियावाकी प्रोजेक्ट के लीड प्यारे लाल ने कहा कि पिछले तीन वर्षों में यह पौधरोपण स्थल काफी विकसित हुआ है, जो अब एक स्थापित शहरी हरित क्षेत्र के रूप में सामने आया है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय नियमित रखरखाव, निगरानी और समुदाय के सक्रिय सहयोग को दिया।
इस प्रयास से न केवल देहरादून में हरित क्षेत्र का विकास हुआ है, बल्कि अन्य शहरों के लिए यह एक मॉडल भी प्रस्तुत करता है। आने वाले वर्षों में, इस तरह की पहलों को बढ़ावा देने के लिए सामुदायिक शिक्षा और जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है।
इस प्रकार, देहरादून का यह प्रयोग यह साबित करता है कि यदि हम स्थानीय स्तर पर सामुदायिक सहयोग से कार्य करें, तो हम अपने शहरों को और अधिक हरित बना सकते हैं।
इसके लिए सभी नागरिकों को आगे आना होगा और ऐसे प्रयासों को सिर्फ तकनीकी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अपने पर्यावरण को बचाने के लिए एक मिशन के तौर पर लेना होगा।
हमारे सामुदायिक प्रयासों के माध्यम से, देहरादून की तरह अन्य शहरों में भी हरे भरे जंगल तेजी से विकसित किए जा सकते हैं। इस दिशा में चलने से न केवल पर्यावरण में सुधार होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ जीवनशैली का निर्माण भी होगा।
इस साझा अनुभव का उद्देश्य सभी को प्रेरित करना और हमारे जलवायु को सुरक्षित रखना है।
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जैसे-जैसे हमारा शहर हरा-भरा होगा, हमें अपनी जिम्मेदारियों को लेकर सजग रहना है। यह जिम्मेदारी हम सभी की है।
संजीव चतुर्वेदी, अनूप नौटियाल, प्रेरणा रतूड़ी, प्यारे लाल जैसी इन प्रेरक आवाजों ने हमें यह बताया कि जब हम मिलकर काम करेंगे, तो हमारे प्रयास फलित होंगे।
Team Haqiqat Kya Hai
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