चार धाम यात्रा: गंगा घाटी के खंडहर बन चुके पैदल मार्गों की कहानी
The post चार धाम यात्रा – गंगा घाटी के पैदल मार्ग बन चुके खंडहर appeared first on Avikal Uttarakhand. 800 गाँवों की पद यात्राएँ कर चुके है पत्रकार संदीप बदलता पर्यटन स्वरुप विषय पर सचित्र माध्यम व्याख्यान पत्रकार संदीप गुसाईं ने साझा किए अपने अनुभव देहरादून। चार धाम यात्रा… The post चार धाम यात्रा – गंगा घाटी के पैदल मार्ग बन चुके खंडहर appeared first on Avikal Uttarakhand.
चार धाम यात्रा: गंगा घाटी के खंडहर बन चुके पैदल मार्गों की कहानी
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कम शब्दों में कहें तो: पत्रकार संदीप गुसाईं ने चार धाम यात्रा पर अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार गंगा घाटी में पैदल मार्ग खंडहरों में तब्दील हो गए हैं।
देहरादून: चार धाम यात्रा का महत्व भारतीय संस्कृति में अनमोल है, लेकिन पृथ्वी के इस भाग में यात्रा की पारंपरिक लोकल मार्गों की स्थिति चिंताजनक हो गई है। वरिष्ठ पत्रकार संदीप गुसाईं ने एक व्याख्यान में बताया कि किस प्रकार पारंपरिक पैदल मार्ग, जो स्वर्णिम अतीत के संकेत थे, अब खंडहरों में तब्दील हो चुके हैं।
पैदल यात्रा और ऐतिहासिक चट्टियाँ
जब सड़क मार्ग का विकास नहीं हुआ था, तब यात्रियों को ऋषिकेश से बदरीनाथ तक की यात्रा पैदल करनी पड़ती थी। इस यात्रा के दौरान कई विश्राम स्थल (चट्टी) होते थे, जहां यात्री रात बिताते थे। लेकिन अब, इन चट्टियों की स्थिति काफी दयनीय हो चुकी है। गंगा घाटी में पैदल मार्ग पर ये पंक्तिबद्ध खंडहर अब केवल अतीत की याद दिलाते हैं।
संदीप ने 2023 में हरिद्वार से केदारनाथ धाम तक की यात्रा उन्हीं चट्टियों के माध्यम से की और अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि पहले ऋषिकेश से बदरीनाथ तक कुल 84 चट्टी थीं और यह यात्रा एक महीने में पूरी होती थी। अब केवल कुछ थोड़ी-सी चट्टियाँ ही रह गई हैं जिनमें दुकानें और धर्मशालाएं मौजूद हैं।
पर्यटन में बदलाव और उसके प्रभाव
संदीप ने चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि आल वेदर रोड परियोजना और ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट के कारण गंगा घाटी पर भारी दबाव डाला गया है। तीर्थाटन की परंपरा अब एक व्यवसाय में तब्दील होती जा रही है, जिससे न केवल संस्कृति का ह्रास हो रहा है, बल्कि पर्यावरण पर भी इसका विपरीत असर पड़ रहा है।
धार्मिक स्थलों का बढ़ता दबाव
ऋषिकेश-देवप्रयाग पैदल मार्ग के 67 किमी क्षेत्र में बड़े होटल और रिसॉर्ट्स के निर्माण और पर्यटन के भीड़भाड़ से गंगा नदी और उसके ईकोसिस्टम पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है, जबकि पौड़ी गढ़वाल के अन्य क्षेत्रों में सन्नाटा व्याप्त है।
गुसाईं ने बताया कि पैदल मार्ग के रखरखाव और जीर्णोद्धार न होने के कारण अब यहाँ केवल स्थानीय गांवों के लोग ही यात्रा करते हैं। 2013 की आपदा के बाद, कई इलाकों में फ्लैश फ्लड और भूस्खलन ने मचाई थी। ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट के बाद इस घाटी के कई गांवों के मकानों मे दरारें पड़ने लगी हैं।
इतिहास की ओर लौटते हुए
संदीप ने अपने व्याख्यान में बताया कि लगभग 100 वर्षों पहले, ऋषिकेश से देवप्रयाग की यात्रा तीन दिनों में पूरी होती थी। यह मार्ग पर काफी सुविधाएं होती थीं, जैसे कि कुली एजेंसी, डिस्पेंसरी और पोस्ट ऑफिस। आज की स्थिति बेहद विकट है; अधिकांश चट्टियाँ खंडहर में तब्दील हो गई हैं और धर्मशालाएं भी नहीं के बराबर हैं।
संदीप ने बताया कि चार धाम यात्रा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए British काल के दौरान भी कई प्रयास किए गए थे। लेकिन अब, जलवायु परिवर्तन और अनियोजित पर्यटन ने इस क्षेत्र के लिए नई चुनौतियां पैदा कर दी हैं। अगर यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियों को इस धरोहर का अनुभव करवाना मुश्किल होगा।
डॉक्टर्स और मीडियाकर्मियों की टिप्पणी
इस कार्यक्रम में कई साहित्यकार, इतिहासकार और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। सभी ने संदीप गुसाईं के अनुभवों को ध्यान से सुना और इस मुद्दे की गंभीरता पर चर्चा की।
संदीप गुसाईं, पौड़ी गढ़वाल से हैं और वह M.A. मास कम्युनिकेशन के स्नातक हैं। उनका अनुभव 800 गाँवों की पद यात्राओं का है और 2023 में उन्होंने चार धाम यात्रा के प्राचीन मार्गों की स्थिति की विस्तृत जानकारी दी।
उनकी व्याख्यान ने यह स्पष्ट किया कि यदि हम अपने पर्यावरण और संस्कृति की रक्षा नहीं करते, तो आने वाली पीढ़ियों को इन स्थलों की महत्वता से वंचित रहना पड़ेगा।
Team Haqiqat Kya Hai
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