कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर आयोजित साहित्यिक विमर्श

The post कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर साहित्यिक विमर्श appeared first on Avikal Uttarakhand. दुदबोलि पत्रिका के नवीन अंक ‘हमरि लोक-थात’ का विमोचन अविकल उत्तराखंड रामनगर। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पांचवीं पुण्यतिथि पर राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़ में दो… The post कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर साहित्यिक विमर्श appeared first on Avikal Uttarakhand.

May 10, 2026 - 00:39
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कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर आयोजित साहित्यिक विमर्श
कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर आयोजित साहित्यिक विमर्श

कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर आयोजित साहित्यिक विमर्श

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कम शब्दों में कहें तो, कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पुण्यतिथि पर दो दिवसीय साहित्यिक विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें उनके साहित्यिक योगदान पर चर्चा की गई।

रामनगर में मठपाल की पुण्यतिथि पर साहित्यिक विमर्श

राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़, रामनगर में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पांचवीं पुण्यतिथि पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर विद्वानों ने मठपाल के साहित्यिक योगदान को रोशनी में लाते हुए उनकी रचनाओं का विश्लेषण किया। इसके साथ ही, उन्होंने उत्तराखंड की लोक परंपराओं पर केंद्रित दुदबोलि पत्रिका के नवीनतम अंक 'हमरि लोक-थात' का विमोचन भी किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सुशीला सूद ने की। उन्होंने कहा कि "मथुरादत्त मठपाल ने शुरुआत हिंदी लेखन से की, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि कुमाउनी उनकी मातृभाषा है और इसके माध्यम से वह अपने विचारों को अधिक सशक्त तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं। 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा कुमाउनी साहित्य की सेवा में लगा दी।"

Mathuradatt Mathpal

मठपाल ने वर्ष 2000 में 'दुदबोलि' पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया, जो प्रारंभ में 60 पृष्ठों की त्रैमासिक पत्रिका थी, और अब यह 350 पृष्ठों की वार्षिकी के रूप में प्रकाशित होती है। इस पत्रिका ने कुमाउनी, गढ़वाली और नेपाली लोक साहित्य को प्रमुखता से स्थान दिया है।

हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश चंद्र पंत ने बताया कि मठपाल का रामगंगा नदी से विशेष लगाव था। उन्होंने रामगंगा पर 'चली रहप गंग हो' जैसी महत्वपूर्ण कविता लिखी और अपने प्रकाशन संस्थान का नाम भी 'रामगंगा प्रकाशन' रखा। मठपाल ने कभी सरकारी सहायता पर निर्भर हुए बिना साहित्य सेवा को आगे बढ़ाने का प्रण लिया।

प्रो. पंत ने 1989 से 1991 के बीच आयोजित क्षेत्रीय भाषाई सम्मेलनों में मठपाल की महत्वपूर्ण भूमिका की भी चर्चा की। उन्होंने कुमाऊं में कई कवि सम्मेलनों का आयोजन किया और 'बसंती काव्य समारोह' के तहत रामनगर में सात कवि सम्मेलनों का सफल आयोजन किया।

कार्यक्रम में डॉ. प्रियदर्शन ने गढ़वाली भाषा में मठपाल के साहित्य पर विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर अन्य विद्वानों ने भी अपने विचार रखे, जबकि निधि अधिकारी, आंचल, विशाल मोनिका और डिंपल ने मठपाल की कविताओं का सस्वर पाठ किया।

दुदबोलि पत्रिका के संपादक चारु तिवारी ने बताया कि इस वर्ष का अंक 'हमरि लोक-थात' शीर्षक से प्रकाशित किया गया है, जिसमें उत्तराखंड की लोक विधाओं, संगीत, रंगमंच, सिनेमा और पारंपरिक लोक कलाओं पर 20 शोधपरक आलेख शामिल हैं। इस अंक में झोड़ा, चांचरी, भगनौल, न्यौली और झुमैलो जैसे लोकगीतों पर भी सामग्री दी गई है।

इस अवसर पर साहित्य प्रेमियों का एक बड़ा समूह उपस्थित था, जिसमें नवीन तिवारी, निखिलेश उपाध्याय, सी.पी. खाती, नवेंदु मठपाल, डॉ. पी.के. निश्चल, डॉ. प्रियदर्शन, डॉ. निधि अधिकारी, श्रीमती दीपा पांडेय और भुवन पपनै शामिल थे।

लोगों की इस एकत्रितता से यह स्पष्ट होता है कि मथुरादत्त मठपाल का योगदान साहित्य जगत में अमिट रहेगा। उनकी रचनाएँ और विचार आज भी युवाओं को प्रेरित करती रहेंगी।

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सौजन्य से,
दीक्षा शर्मा,
टीम हकीकत क्या है

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