बुग्यालों के संरक्षण के लिए आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान

The post बुग्याल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण व पारंपरिक ज्ञान जरूरी appeared first on Avikal Uttarakhand. अविकल उत्तराखण्ड देहरादून। मैती संस्था, यूकॉस्ट एवं हेस्को के संयुक्त तत्वावधान में बुग्याल संरक्षण दिवस के अवसर पर “उत्तराखण्ड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण: वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक… The post बुग्याल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण व पारंपरिक ज्ञान जरूरी appeared first on Avikal Uttarakhand.

Sep 3, 2026 - 00:39
 163  501.8k
बुग्यालों के संरक्षण के लिए आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान
बुग्यालों के संरक्षण के लिए आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान

बुग्यालों के संरक्षण के लिए आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान

Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - Haqiqat Kya Hai

कम शब्दों में कहें तो, बुग्यालों का संरक्षण न केवल वैज्ञानिक अनुसन्धान बल्कि स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान पर भी निर्भर करता है।

देहरादून। उत्तराखंड में बुग्याल के संरक्षण के लिए एक विशेष सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें मैती संस्था, यूकॉस्ट और हेस्को की भागीदारी थी। इस सेमिनार का मुख्य विषय था "उत्तराखंड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण: वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारंपरिक ज्ञान एवं संरक्षण कार्यवाही"। सेमिनार का उद्देश्य बुग्यालों के संरक्षण में वैज्ञानिक शोध, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अनुभवों को साझा करना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ

सेमिनार का आरंभ मैती संस्था के संस्थापक और सचिव पद्म श्री डॉ. कल्याण सिंह रावत द्वारा स्वागत सम्बोधन के साथ हुआ। उन्होंने बुग्यालों को उत्तराखंड की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर बताते हुए इनका संरक्षण करने के लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया।

विशेषज्ञों के व्याख्यान

सेमिनार के दौरान विभिन्न विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए। डॉ. जी. एस. रावत, पूर्व निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने बुग्यालों के पारिस्थितिक महत्व और इनके संरक्षण की चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए। इसके अलावा, डॉ. गजेन्द्र सिंह, वैज्ञानिक, उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (USAC) ने बताया कि कैसे वैज्ञानिक और अंतरिक्ष तकनीक के माध्यम से बुग्यालों का अध्ययन और संरक्षण किया जा सकता है।

इसी तरह, डॉ. जी. सी. एस. नेगी, एमेरिटस वैज्ञानिक, मानसखंड विज्ञान केंद्र ने हिमालयी पर्यावरण और बुग्यालों के संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा की। डॉ. डी. पी. उनियाल, संयुक्त निदेशक, यूकॉस्ट ने भी बुग्याल संरक्षण में विज्ञान और तकनीकी दृष्टिकोण की भूमिका पर विचार व्यक्त किए।

सरकारी समर्थन

कार्यक्रम में उत्तराखंड वन विभाग की अपर सचिव सुश्री कल्याणी और प्रसिद्ध फोटोग्राफर पद्म श्री श्री अनूप साह की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया। मुख्य अतिथि श्री सुबोध उनियाल, कैबिनेट मंत्री, वन, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा ने बुग्यालों के संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हर वर्ष बुग्याल दिवस मनाया जाएगा, जिससे स्थानीय लोगों और जनसाधारण को जागरूक किया जा सके।

मान्यता और पुरस्कार

कार्यक्रम में पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'गिरि गंगा गौरव सम्मान' और 'मैती सम्मान' प्रदान किया गया। विशेष सम्मान निम्नलिखित व्यक्तित्वों को दिया गया: डॉ. जी. सी. एस. नेगी (पर्यावरण एवं शोध में उत्कृष्टता), प्रो. दुर्गेश पंत (विज्ञान एवं तकनीकी नवाचार में योगदान), और अधिवक्ता ललित जोशी (शिक्षा एवं सामाजिक कार्य में योगदान)।

बुग्यालों का महत्व

कार्यक्रम में वक्ताओं ने सामूहिक रूप से इस बात पर जोर दिया कि उत्तराखंड के बुग्याल केवल उच्च हिमालयी क्षेत्रों के घास के मैदान नहीं, बल्कि राज्य की जैव विविधता, जल स्रोतों, पारिस्थितिकी, स्थानीय आजीविका एवं सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण आधार हैं। इनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों की सहभागिता आवश्यक है।

सेमिनार का संचालन डॉ. भवतोष शर्मा ने किया, जिसमें अनेक गणमान्य व्यक्ति, पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, शिक्षाविद् तथा सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।

अधिक जानकारी और अपडेट्स के लिए [यहाँ](https://haqiqatkyahai.com) पर जाएँ।

टीम हकीकत क्या है, सुरभी शर्मा

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow