नई दिल्ली: डॉ. हरिसुमन बिष्ट के साथ हिमालय का एक अनूठा दृश्य
आजकल एनेक्सी,इंटर नेशनल सेंटर,नई दिल्ली के सबसे नीचले तल में अद्भुत चित्र प्रदर्शनी चल रही है। मुझे इसके उद्घाटन और चित्रों पर आयोजित कार्यक्रम में कई वक्तव्यों को सुनने और उस संदर्भ में हिमालय को समझने का मौका मिला। इस चित्र प्रदर्शनी का आयोजन ‘पहाड़ ‘और इंडिया इंटर नेशनल सेंटर के संयुक्त तत्वाधान में किया […] The post New Delhi:-हिमालय को ऐसे भी देखें-डॉ.हरिसुमन बिष्ट appeared first on संवाद जान्हवी.
नई दिल्ली: डॉ. हरिसुमन बिष्ट के साथ हिमालय का एक अनूठा दृश्य
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कम शब्दों में कहें तो, नई दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर में चल रही अद्भुत चित्र प्रदर्शनी ने हिमालय की एक नई सुंदरता को उजागर किया है। इस कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ. हरिसुमन बिष्ट के द्वारा किया गया, जहां उन्होंने हिमालय के महत्व और इसके संरक्षण के विषय में अपनी बातें साझा की।
इंटरनेशनल सेंटर के सबसे नीचले तल में चल रही इस प्रदर्शनी का आयोजन 'पहाड़' और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के संयुक्त तत्वाधान में हुआ है। यह प्रदर्शनी सामान्य प्रदर्शनी की तरह मात्र दृश्य कला नहीं है, बल्कि यह 170 वर्ष पुरानी धरोहर को दर्शाती है। ये चित्र 1854 से 1856 के बीच तीन जर्मन भाइयों, रॉबर्ट, हर्मन और एडॉल्फ स्क्लेजिनविट द्वारा बनाए गए थे, जिन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत भारत और एशिया के विभिन्न भागों का सर्वेक्षण करने का कार्य सौंपा गया था।
यह वह समय था जब डिजिटल फोटोग्राफी का कोई अस्तित्व नहीं था और कैमरों का उपयोग इस तरीके से नहीं होता था। उस समय की यात्रा पैदल, घोड़े, खच्चर या नावों द्वारा होती थी। जर्मन भाइयों ने विभिन्न मनमोहक दृश्यों को कैनवास पर उतारने का कार्य किया, जिसमें इनकी कला में प्राकृतिक रंगों का प्रमुखता से इस्तेमाल किया गया।
यह चित्र प्रदर्शनी मात्र कला का संग्रह नहीं है, बल्कि यह हमारे अतीत को समझने का एक माध्यम भी है। ये चित्र हमारे हिमालय की संस्कृति, जीवनशैली और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में मदद करते हैं। हिमालय, जो भारतीय जीवन दर्शन का एक प्रमुख स्रोत है, हमें जीवनदायिनी नदियों का आशीर्वाद देता है। इसकी उपादेयता हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
जब मैं इन चित्रों का अवलोकन कर रही थी, एक विशेष चित्र ने मेरी रुचि को आकर्षित किया। वह चित्र फिल्लौर गांव का था, जिसके बारे में मैंने केवल सुना और पढ़ा था, किंतु कभी देखा नहीं था। हम सभी भारतीय निवासी आध्यात्मिकता के महत्व को समझते हैं और इसे अपनी जीवन शैली में बुनते हैं। 'ॐ जय जगदीश हरे' प्रार्थना करोड़ों भारतीयों की आस्था की अभिव्यक्ति है, जिसे श्रद्धा राम फिल्लौरी ने लिखा था। इसका महत्व आज भी जीवित है।
प्रदर्शनी से प्राप्त चित्रों ने मुझे अपने उपन्यास "बत्तीस राग गाओ मोला" में वर्णित महान चित्रकार मोला राम के रंगों के कौशल को याद दिला दिया। यह उस समय के रंग प्रयोगों का एक दस्तावेज़ है।
चित्र प्रदर्शनी का महत्व केवल कला तक सीमित नहीं है; यह उस समय की जटिलता और विशेषकर पंडित नैन सिंह रावत के जीवन को समझने में भी सहायक है। नैन सिंह ने जर्मन भाइयों के साथ कूली के रूप में काम किया और अपनी बुद्धि और विवेक से पंडितों के पंडित बने।
इस प्रदर्शनी के महत्व को आम जन तक पहुंचाने का श्रेय प्रो शेखर पाठक को जाता है। यदि प्रो शेखर दा का म्यूनिख में वक्तव्य नहीं होता, तो हम इन दुर्लभ चित्रों की अहमियत को नहीं समझ पाते। यह सच है कि उनकी मेहनत और टीम, जिसमें चंदन डांगी, कमला कर्नाटक, खुशहाल सिंह रावत, हृदेश जोशी, और के सी पांडे शामिल थे, ने हामीशेर चित्र प्रदर्शनी को लोगों तक पहुंचाया।
मैं आशा करती हूं कि युवा पीढ़ी इस चित्र प्रदर्शनी को देखकर प्रेरित होगी और इसे अपने अनुभव का हिस्सा बनाएगी।
इस अद्वितीय चित्र प्रदर्शनी के लिए एक बार फिर से डॉ. हरिसुमन बिष्ट को धन्यवाद और उनकी टीम को हार्दिक बधाई।
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