छात्रसंघ चुनाव: DAV देहरादून में नवदीप राणा की जीत, हल्द्वानी में निर्दलीय ने दिलाई चुनौती, पहाड़ों में NSUI की बढ़त

HALDWANI/DEHRADUN: झड़प, मारपीट, हिंसा, तोड़फोड़की घटनाओं के बीच  उत्तराखंड के विभिन्न कॉलेजों में छात्रसंघ चुनावों के नतीजे आ गए हैं। पहाड़ के कॉलेजों में एनएसयूआई ने अच्छा प्रदर्शन किया है, जबकि शहरी क्षेत्रों में एबीवीपी ने परचम लहराया है। सूबे के सबसे बड़े डीएवी कॉलेज में भी एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की […] The post छात्रसंघ चुनाव: DAV देहरादून में नवदीप बने अध्यक्ष, हल्द्वानी में निर्दलीय ने छुड़ाए पसीने, पहाड़ों में NSUI अव्वल appeared first on Devbhoomi Dialogue.

Sep 30, 2026 - 00:39
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छात्रसंघ चुनाव: DAV देहरादून में नवदीप राणा की जीत, हल्द्वानी में निर्दलीय ने दिलाई चुनौती, पहाड़ों में NSUI की बढ़त

छात्रसंघ चुनाव: DAV देहरादून में नवदीप बने अध्यक्ष, हल्द्वानी में निर्दलीय ने छुड़ाए पसीने, पहाड़ों में NSUI अव्वल

कम शब्दों में कहें तो, छात्रसंघ चुनावों में टीम एबीवीपी ने देहरादून में शानदार प्रदर्शन किया है, जबकि लालचौक हल्द्वानी में निर्दलीय उम्मीदवारों ने जबरदस्त प्रतिस्पर्धा दी है। पहाड़ियों में एनएसयूआई ने अपनी स्थिति मजबूत की है। Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - Haqiqat Kya Hai

हल्द्वानी और देहरादून: उत्तराखंड के विभिन्न कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव का नतीजा आया है। झड़पें, हिंसा और कई घटनाओं के बीच, एबीवीपी ने देहरादून के डीएवी कॉलेज में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की, जबकि हल्द्वानी में निर्दलीय उम्मीदवारों ने ठगने का कार्य किया। पहाड़ी कॉलेजों में एनएसयूआई ने अच्छा प्रदर्शन किया है, जिससे यह चुनावी परिणाम बेहद दिलचस्प बने हैं।

देहरादून में एबीवीपी का प्रभाव

देहरादून के डीएवी कॉलेज में हंगामे के बीच आयोजित छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी के नवदीप राणा ने अध्यक्ष पद पर विजय प्राप्त की। उन्होंने एनएसयूआई के सौरभ सेमवाल को 96 मतों से हरा दिया। उपाध्यक्ष के पद पर एसएफआई के शैलेन्द्र नेगी ने 700 मतों से जीत हासिल की। महासचिव पद पर निर्दलीय उम्मीदवार नीलांश ने अपनी जीत दर्ज की। यह नतीजे यह दर्शाते हैं कि एबीवीपी अभी भी मुख्यधारा में बना हुआ है।

इसके अलावा, देहरादून के एसजीआरआर पीजी कॉलेज में एबीवीपी के साहिल पंवार ने 388 वोट प्राप्त करके अध्यक्ष पद जीता। उन्होंने एनएसयूआई की स्मिता चौहान को बड़े अंतर से हराया। इसी प्रकार, एमकेपी पीजी कॉलेज में एबीवीपी की आयुषी पैन्यूली ने 268 वोट पाकर अध्यक्ष पद हासिल किया।

हल्द्वानी में निर्दलीय की जीत

हल्द्वानी में छात्रसंघ चुनाव के नतीजे ने सबको चौंका दिया है। निर्दलीय उम्मीदवारों ने एबीवीपी और एनएसयूआई दोनों को टक्कर देते हुए अधिकत्तर सीटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। खास तौर पर, पीजी कॉलेज ऋषिकेश में निर्दलीय प्रत्याशी वैभव रावत ने 43 मतों से जीत हासिल की, जिससे यह साबित होता है कि निर्दलीय प्रत्याशियों की स्थिति भी मजबूत हो रही है।

इसके अलावा, धर्मानंद उनियाल राजकीय महाविद्यालय नरेंद्रनगर में भी एनएसयूआई ने सभी पद जीते। एनएसयूआई के आयुष रावत ने एबीवीपी उम्मीदवार को 69 मतों से हराया। यह प्रदर्शन यह दर्शाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में एनएसयूआई का दबदबा बढ़ रहा है।

कुमाऊं में उत्सव जैसा माहौल

कुमाऊं के एमबीपीजी कॉलेज में चुनाव के दौरान आदान-प्रदान का एक बड़ा सबूत दिखा। यहां निर्दलीय उम्मीदवार आर्यन बेलवाल ने एबीवीपी और एनएसयूआई के प्रत्याशियों को कड़ी चुनौती दी। परिणाम के अनुसार, आर्यन ने अपनी बढ़त बनाए रखी, जबकि नैनीताल के डीएसबी परिसर में निर्दलीय प्रत्याशी भानूप्रताप सिंह चौहान ने एबीवीपी के शुभम कुमार को मात दी। यह चुनाव निश्चित रूप से आगे के राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करेगा।

बागेश्वर के विभिन्न कॉलेजों में एनएसयूआई ने शानदार प्रदर्शन किया, जहां उन्होंने अध्यक्ष पद सहित कई प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। हालाँकि, पंडित बद्रीदत्त पांडे परिसर में एबीवीपी और एनएसयूआई के उम्मीदवारों का पर्चा खारिज होने के बाद अव्यवस्था उत्पन्न हुई।

आखिरकार, सोबन सिंह जीना परिसर, अल्मोड़ा में भी एबीवीपी के रोहित कुमल्टा ने जीत दर्ज की, जो उनके सामर्थ्य का प्रमाण है। यह सभी नतीजे एक नई राजनीतिक दिशा को दर्शाते हैं।

निष्कर्ष

छात्रसंघ चुनावों के परिणाम यह दिखाते हैं कि उत्तराखंड में राजनीतिक परिवेश धीरे-धीरे बदल रहा है। हर क्षेत्र में अलग-अलग दलों की पकड़ और प्रभाव स्पष्ट होता नजर आ रहा है। भले ही एबीवीपी शहरी क्षेत्रों में मजबूत स्थिति बनाए हुए है, लेकिन हल्द्वानी और पहाड़ी कॉलेजों में निर्दलीय और एनएसयूआई की बढ़त यह दर्शाती है कि छात्रों के बीच फैसले की शक्ति अब व्यापक हो चुकी है।

इन चुनावों ने साफ किया है कि भविष्य में युवा वर्ग के विचार और उनके वोटर के रूप में सक्रिय होने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यह राजनीतिक गतिविधियां न केवल कॉलेजों में, बल्कि उस क्षेत्र के समाज में भी बड़े बदलाव ला सकती हैं।

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