श्रद्धांजलि: जुनूनी पत्रकार दिलवर सिंह बिष्ट का सच्चा सफर
The post श्रद्धांजलि- अलविदा जुनूनी पत्रकार दिलवर सिंह बिष्ट! appeared first on Avikal Uttarakhand. टीस-पहाड़ी इलाके की खबरों पर खपने वाले दिलवर ‘पत्रकार’ होने को तरस गया … सोमवार की रात जब रुद्रप्रयाग जनपद के बच्चणस्यू पट्टी अंतर्गत सिप्रि गांव की पहाड़ियों पर कोहरा… The post श्रद्धांजलि- अलविदा जुनूनी पत्रकार दिलवर सिंह बिष्ट! appeared first on Avikal Uttarakhand.
श्रद्धांजलि: जुनूनी पत्रकार दिलवर सिंह बिष्ट का सच्चा सफर
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कम शब्दों में कहें तो, दिलवर सिंह बिष्ट, एक ऐसे पत्रकार whose dedication to journalism remained unrecognized, has left a void in the field of journalism. रुद्रप्रयाग के बच्चणस्यू पट्टी अंतर्गत सिप्रि गांव में जब सोमवार रात कोहरा छंट रहा था, तो शायद वह रास्ता उनके कदमों की अंतिम आहट का गवाह बना।
90 के दशक का निडर और स्थायी पत्रकार, दिलवर जिंदगी की जंग हार गए। उनका सपना हमेशा यही रहा कि उन्हें ‘पत्रकार’ के रूप में मान्यता मिल जाए। स्नातक के बाद जब अन्य युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे, दिलवर ने अपनी माटी नहीं छोड़ी और मेरठ से छपने वाले समाचार पत्रों के साथ अपने ग्रामीण पत्रकारिता का सफर शुरू किया।
दिलवर ने कठिनाइयों का सामना करते हुए रोजाना 10-15 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। चढ़ाई-उतराई में आय का कोई साधन नहीं था, और फिर भी वह हर दिन खांखरा से रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय पहुंचते। वह दिन-रात्रि एक करके खबरें लिखते थे और इस प्रक्रिया में उन्होंने अपनी आत्मा को बखेर दिया।
डिजिटल युग में, जब उनके गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं आता था, दिलवर पहाड़ की ऊँचाई पर सुबह जल्दी चढ़ जाते थे, ताकि वहां बैठकर घटनाक्रम की खबरें ले सकें। कभी-कभी तो वह मुझे सुबह-सुबह फोन कर देते थे कि क्या देहरादून में कोई घटना हुई है।
दिलवर बिष्ट को जिला सूचना कार्यालय ने ‘कवर पत्रकार’ के रूप में मान्यता दी, लेकिन सरकारी तंत्र की कठिनाइयां उनकी निष्ठा को कभी भी सही मान्यता नहीं दिला सकीं। उन्हें मान्यता के लिए एक वेतन पर्ची या बैंक चेक की आवश्यकता थी, जो कभी भी उसे नहीं मिली। हर बार जब भी हिम्मत हारने का समय आता, वह अपनी आंखों में उम्मीद की लौ लेकर मुस्कुराते हुए कहते थे, “भाई साहब, मैं अपने आप को सूचना विभाग की नजरों में पत्रकार साबित करके रहूंगा।”
सोमवार की रात दिलवर ने जिंदगी की जंग हारकर हमेशा के लिए आंखें मूंद ली। उनके साथ गई जीवन की इस सत्यता ने एक ऐसा दुख तनहा छोड़ दिया है, जो उनके परिवार के लिए असहनीय है। उनके पीछे दो मासूम बेटियां और एक बेटा है, जिनकी पढ़ाई अभी जारी है।
रुद्रप्रयाग के हर गली, हर चोटी आज यह सवाल पूछ रही है, क्या पत्रकारिता का यही सिला मिलता है? क्या कागज का एक बेजान टुकड़ा उस इंसान की ईमानदारी से बड़ा है जो अपनी जिंदगी केवल सच लिखने में होम कर दी? अलविदा दिलबर जी! आपकी कलम का यह कर्ज शायद कभी न चुका पाए। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति दे और इस टूटे हुए परिवार को दुख सहने की शक्ति दे।
Team Haqiqat Kya Hai
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