उमरिया: 18 साल से कम उम्र में मिली सरकारी नौकरी, शिक्षा विभाग में हुआ बड़ा खुलासा
The post उमरिया 18 से कम और मिल गयी सरकारी नौकरी appeared first on Avikal Uttarakhand. चालीस साल की नौकरी के बाद पकड़ा गया झूठ शैलेश मटियानी पुरस्कार से सम्मानित है शिक्षक जॉच के बाद शिक्षा विभाग ने कहा, नियमों का हुआ है उल्लंघन 17 साल… The post उमरिया 18 से कम और मिल गयी सरकारी नौकरी appeared first on Avikal Uttarakhand.
उमरिया: 18 साल से कम उम्र में मिली सरकारी नौकरी, शिक्षा विभाग में हुआ बड़ा खुलासा
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कम शब्दों में कहें तो, एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जहां एक व्यक्ति को 18 साल से कम उम्र में सरकारी नौकरी दी गई। यह मामला शिक्षा विभाग में नियुक्ति प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
कोटद्वार, देहरादून। पिछले चार दशकों से शिक्षा विभाग में ऊंचे पद के बारे में एक बड़ा झूठ अब सामने आया है। यह मामला एक शिक्षक नफीस अहमद से जुड़ा हुआ है, जिन्हें हाल ही में शैलेश मटियानी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस मामले में 17 साल 11 महीने और 11 दिन की उम्र में उनकी सरकारी नौकरी को कानूनी समस्या का सवाल बन गया है।
पार्षद की शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
यह मामला पौड़ी जिले के कोटद्वार का है, जहाँ पार्षद विपिन डोबरियाल ने शिकायत की थी कि राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, बालक नगर क्षेत्र में कार्यरत शिक्षक नफीस अहमद की नियुक्ति नियमों के खिलाफ हुई है। विभागीय जांच में इस शिकायत को सही माना गया और रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि नफीस की आयु जब नियुक्ति की गई थी, तब वह 18 वर्ष से कम थी।
शासन के नियमों का उल्लंघन
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली 1981 के अनुसार, सरकारी नौकरी के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। शिक्षा विभाग की जांच से पता चला कि 1985 में नफीस की आयु केवल 17 साल 7 माह 11 दिन थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी नियुक्ति नियमों के उल्लंघन के अंतर्गत आती है।
जांच रिपोर्ट का महत्व और आगामी कार्रवाई
जिला शिक्षा अधिकारी (प्राथमिक शिक्षा) पौड़ी गढ़वाल द्वारा निदेशक, प्रारंभिक शिक्षा को भेजी गई रिपोर्ट में कहा गया है कि नफीस अहमद की नियुक्ति निर्धारित आयु से पहले की गई है। अब इस मामले में आवश्यक दिशा-निर्देश प्रदान करने की मांग की गई है। पिछली जांचों में भी इस मुद्दे पर कई बार संकेत दिए गए थे, लेकिन अब स्थिति स्पष्ट होती जा रही है।
जिला शिक्षा कार्यालय द्वारा इस मामले में पहले भी संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया गया था। उप शिक्षा अधिकारी दुगड्डा को इस मामले में जांच अधिकारी नामित किया गया था, और उन्होंने 12 फरवरी 2026 को अपनी रिपोर्ट पेश की थी।
शिक्षा विभाग की पारदर्शिता पर उठे सवाल
इस मामले की गंभीरता ने शिक्षा विभाग में नियुक्ति प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और जांच सिस्टम को लेकर सवाल उत्पन्न कर दिए हैं। ऐसे मामलों में उचित कार्यवाही न होने से शिक्षण संस्थाओं की प्रतिष्ठा पर खतरा बना रहता है। अब देखना यह है कि बेसिक शिक्षा निदेशक इस मुद्दे पर क्या निर्णय लेते हैं।
देखें पत्र
इस मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि इस तरह की नियुक्तियों के लिए सभी शैक्षणिक संस्थानों को अधिक कठोर जांच प्रणाली की आवश्यकता है? हमें अपने विचार साझा करें।
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